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sardar patel biography in hindi |सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन परिचय | सरदार वल्लभ भाई पटेल की जीवनी

sardar patel biography in hindi



सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन परिचय | सरदार वल्लभ भाई पटेल की जीवनी 


नाम:- वल्लभ भाई पटेल

 जन्म:-  31 अक्टूबर, 1875

पिता:-  झावेर भाई पटेल 

माता:- लाडबाई पटेल 

पत्नी:- झावेरवा  पटेल 

बच्चे:- मडिबेन पटेल , डाया भाई पटेल

स्वर्गवास :15 दिसंबर, 1950


सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे। इनका नाम वल्लभ भाई पटेल था, पर इनके द्वारा किये गये काम और इनकी छमता देखकर महत्मा गाँधी ने इन्हे सरदार की उपाधि दी थी, तबसे इनके नाम के साथ सरदार जुड़ता है। इन्होने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खेड़ा और बारडोली सत्याग्रह का सफलता पूर्वक नेतृत्व किया। 563 रियासतों को एक कर अखण्ड और मजबूत भारत का निर्माण किया।  


सरदार पटेल का प्रारंभिक जीवन :- 


 
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म गुजरात के एक छोटे से गाँव नाडियाड में 31 अक्टूबर 1875 मे हुआ था। इनके पिता एक गरीब  किसान थे और माता लाडबाई एक साधारण महिला थी। इन्होने शुरुआती शिक्षा अपने गाँव के स्कूल से ही प्राप्त की।  उन्होंने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा 1896 में उत्तीर्ण की। 

आपको यह जान कर आस्चर्य होगा की सरदार पटेल ने 10वीं की परीक्षा 22 साल की उम्र मे पास की। ऐसा नही है की वह पढ़ने लिखने मे सही नही थे उनका परिवार बहुत गरीब था जिसके कारण पिता के साथ काम करने के लिये बीच मे ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनके लगाव को देख कर उनके पिता ने दोबारा उनका नाम स्कूल मे लिखवा तब तक वह 19 साल के हो चुके थे। 

कुछ दिनों बाद उनकी सादी झाबेर बा से हुई। जिन्होंने 1904 में पुत्री मणिबेन और 1905 में पुत्र डाया भाई को जन्म दिया। सरदार पटेल जब 33 साल के थे तब उनकी पत्नी की मृत्यु कैंसर से होगई। 

सरदार पटेल वकील बनना चाहते थे और इसलिए लॉ की पढ़ाई के लिए वह इंग्लैंड जाना चाहते थे।  लेकिन उनके पास इंग्लैंड जाने के लिए पैसे नही थे। उनके पास तो इतने भी पैसे नही थे की वह भारत के ही किसी कॉलेज मे पढ़ सके।

तब उन्हें पता चला की जिला अधिकारी की परीक्षा मे जो सबसे जादा अंक लाएगा उसे लंदन मे जाकर पढ़ने का मौका मिलेगा। तब उन्होंने अपने पहचान के एक वकील से कित्ताब उधार ली। और खुद पढ़ने लगे जब परीक्षा हुई तो उन्हें सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुये, 

फिर 36 साल की उम्र मे उन्हें इंग्लैंड मे जाकर पढ़ने का मौका मिला। उस समय वकालत का कोर्स 36 महीने का हुआ करता था लेकिन सरदार पटेल ने मात्र 30 महीने मे कोर्स पूरा कर दिया और उन्हें लॉ की डिग्री प्राप्त हुई।   


1913 में वह भारत लौटे और अहमदाबाद कोर्ट में वकालत करने लगे। अपनी मेहनत से कुछ ही दिनों मे वह काफी लोकप्रिय हो गए। फिर मित्रों के कहने पर 1917 मे सरदार पटेल ने  अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और उसमे उन्हें विजय प्राप्त हुई।

सरदार पटेल महत्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। उन्होंने गाँधी जी के चंपारण सत्याग्रह की सफलता के बारे मे सुना था और उसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा। साल 1918 में गुजरात सूखा पड़ा, और खेड़ा खंड में तो बहुत बुरे हालात थे। सूखा पड़ने के कारण खेड़ा के किसानों ने अंग्रेजो से कृसि कर मे कुछ छुट्ट की मांग की लेकिन अंग्रेजो ने मना कर दिया था। 

तब सरदार पटेल ने किसनो के हक के लिये वकालत छोड़ दी और एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया, लम्बे वक्त तक अंग्रेजो से संघर्ष चलने के बाद अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा। और यहाँ से सरदार पटेल ने राजनीती मे कदम रखा। 


 सरदार पटेल का राजनैतिक जीवन :-
 

खेड़ा सत्याग्रह का सफलता पूर्वक  नेतृत्व करने, से सरदार पटेल राष्ट्रीय नायक के रूप में उभर कर सामने आये, और उनकी चर्चा देश विदेश तक होने लगी अंग्रेजो से लेकर गाँधी जी तक को उनकी छमता का पता चला। फिर सरदार पटेल को गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति किया गया। 

 
अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने अंग्रेजो के प्रति अपना रुख और कड़ा किया और गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के साथ जुड़े गये और पुरे गुजरात असहयोग आंदोलन को आगे बढ़या। उन्होंने इसकी शुरुआत खुद अपने  विदेशी कपड़ों का त्याग कर  किया और खादी के कपडे, धोती और कुरता पहनना शुरू किया। 

गुजरात का बरदोली तालुका 1928 मे भारी अकाल से पीड़ित था। ऐसे संकट के समय  में भी  अंग्रेज सरकार ने राजस्व करों को घटाने के बजाय और 30 प्रतिशत बढ़ा दिया। तब सरदार पटेल फिर  किसानो के साथ खड़े हुये और अंग्रेज सरकार से करों को कम करने की गुहार लगाई। लेकिन हुआ इसका उल्टा अंग्रेज सरकार ने कर माफ करने के बजाय करो को वसूलने के दिन की भी घोषणा कर दी। अंग्रेजो ने उन्हें कम करके आँकने की बड़ी भूल कर दी। 

 

सरदार पटेल ने किसानो को इकठ्ठा किया और उनसे करों की एक भी पाई न चुकाने के लिए कहा। अंग्रेज सरकार ने इस संघर्ष को किसी भी तरह खत्म करने की कोशिश की लेकिन वह उसमे सफल ना हो पाए और अंततः उन्हें सरदार पटेल के आगे झुकना ही  पड़ा। बरदोली में इस संघर्ष को सफलता पूर्वक चलाने के कारण और अंग्रेजो से अपनी बात मनवाने के कारण पुरे भारत में सरदार पटेल का राजनैतिक कद और बढ़ गया। 

1930 में महत्मा गाँधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह मे सरदार पटेल ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। अंग्रेजो ने सरदार पटेल के बढ़ते राजनैतिक कद के कारण उनसे काफी डरने लगे और उनको राजनितिक छेत्र मे और आगे ना बढ़ने देने का सोच कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन हुआ इसके विपरीत अंग्रेजो के द्वारा गिरफ्तार करने के कारण उनकी छवि और मजबूत हो गई। और उनके समर्थकों ने पुरे गुजरात में आन्दोलन और तीव्र कर दिया जिसके कारण अंग्रेज सरकार को  सरदार पटेल को रिहा करना ही पड़ा।  

साल 1932 के लंदन हुये  गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद अंग्रेजो ने उन्हें और महात्मा गाँधी को कैद कर लिया और यरवदा जेल मे एक साथ डाल दिया। यहाँ सरदार पटेल को महत्मा गाँधी के पास जाने का उनसे सिखने का और मौका मिल गया। 

फिर इसके बाद सरदार पटेल को भारत की आजादी के आंदोलनों मे भाग लेने के कारण कई जेल मे डाला गया। लेकिन सरदार पटेल झुके नही भारत देश को आजादी दिलाने के लिये लगे रहे। 


जब 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन चलाया। यह बहुत ही विशाल आंदोलन था आम जनता भी कांग्रेस का भरपूर साथ दे रही थी। अंग्रेज सरकार इस आंदोलन से बहुत घबरा गई और किसी भी कीमत मे यह आंदोलन खत्म करना चाहती थी। इसलिए  सरदार पटेल सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेताओ को जेल में डाल दिया। सभी नेताओं को तीन साल तक जेल मे रखने के बाद छोड़ा  गया। 


जेल से निकलने के बाद सरदार पटेल ने स्वतंत्रता की लड़ाई और तेज कर दी। उन्होंने बोला वह जेल जाने से नहीं डरते और वह भारत को स्वतंत्रता दिला कर रहेंगे। 

देश के प्रथम प्रधानमंत्री का चुनाव:- 


15 अगस्त 1947 में भारत आजादी मिलने  के बाद  काँग्रेस में प्रधानमंत्री के पद के लिए  चुनाव किये गये थे, जिसमे सरदार पटेल को सबसे ज्यादा वोट  प्राप्त हुए थे। पर गाँधी जी के कहने पर जवाहरलाल नेहरू को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया। किसी को कभी पता नहीं चला गाँधी जी ने नेहरू जी को ही क्यों चुना, सरदार पटेल ने कभी इस फैसले का विरोध नहीं किया। जो भी जिम्मेदारी मिली उसे बा खूबी से निभाया। 


देशी रियासतों का भारत मे विलय :-


स्वतंत्रता के समय भारत में कुल 565 रियासतें थीं। जिन्हे अंग्रेजो द्वारा यह अधिकार दिया गया की वह भारत या पाकिस्तान मे मिल जाये। कुछ रियासते जिनके राजा, महराजा और नवाब देश भक्त थे वे अपनी इक्षा से अपनी रियासत का विलय भारत मे कर दिया।और लोकतंत्र को स्वीकार कर लिया वह भी जानते हुये की वह भी लोकतंत्र मे एक आम आदमी की तरह बस एक नागरिक रह जायेंगे , उनकी ताकत और संपत्ति पहले जैसी नही रहेगी। 


 लेकिन  कुछ राजा, महाराजा और नवाब, दौलत और सत्ता के नशे मे चूर थे। वे एक स्वतंत्र शासक बनने के सपने देख रहे थे। वे कहते थे की भारत एक लोकतान्त्रिक देश बन रहा है ऐसे मे उन्हें वह अधिकार नही मिलेंगे जो एक राजा और नवाब को मिलता है। कई राजाओं ने तो भारत से लड़ने के लिये अपनी सेना तक बनानी शुरू कर दी थी। कुछ तो और आंगे बढ़कर अपने प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) भेजनें की योजना बना रहे थे।


 तब फिर कमान सम्हली सरदार बल्ल्भ भाई  पटेल ने उन्होंने ऐसे सभी राजाओं और नवाबो को कहा आप सभी देश भक्ति दिखाएं और स्वतंत्र भारत से जुड़े और जिम्मेदार राजा की तरह अपनी प्रजा और उनके भविष्य के बारे मे सोचे, अगर आपको उनकी चिंता है।  


सरदार पटेल ने ऐसी सभी  रियासतों के राजाओं और नवाबो को यह स्पष्ट बोल दिया की अलग देश का जो सपना देख रहे है वह  संभव नही है, भारत का हिस्सा बनने में ही उनकी भलाई है, और उनकी जिम्मेदारी है।

 इस ऐलान के बाद वह अपनी महान बुद्धिमत्ता और राजनैतिक दूरदर्शिता, और अपनी मजबूत छवि के साथ कई  रियासतों का भारत मे विलय करवाया। उनकी इस पहल का उन  रियासतों की जनता का भरपूर भी समर्थन मिल रहा था। जिससे उनका सपना सभी रियासतों को एक करके अखण्ड और मजबूत भारत बनाने साकार होता दिख रहा था। 

लेकिन  कुछ रियासतों ने भारत मे मिलने से मना कर दिया, जिनमे त्रावणकोर रियासत, जूनागढ़ रियासत, हैदराबाद रियासत था। फिर सरदार पटेल ने अपनी सूझ बुझ और इक्छा सकती से इन्हे भी भारत मे मिला लिया। चलिए देखते है कैसे इन तीनों रियासतों को भारत मे मिलाया। 


जूनागढ़ को भारत मे कैसे मिलाया सरदार पटेल ने :- 


जूनागढ़ के नवाब महावत खान पाकिस्तान मे अपनी रियासत को मिलाना चाहते थे। लेकिन वहां की जनता बिलकुल भी ऐसा नही चाहती थी क्योंकी हिन्दुओ की ज्यादा आबादी थी। जिन्ना और मुस्लिम लीग किसी भी तरह जूनागढ़ को पाकिस्तान मे मिलाना चाहते थे। 

उन्होंने पहले मौजूदा दिवान  अल्लाबख्श को हटाकर अपने भरोसेमंद आदमी  शाहनवाज भुट्टो (पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) को नया दीवान बनाया। फिर नवाब महावत खान से 14 अगस्त, 1947 मे जूनागढ़ को पाकिस्तान में विलय कराने का  एलान करवाया। 

सरदार पटेल इनकी चालबाजी समझ गये और अब उन्होंने जूनागढ़ को भारत मे मिलाने का कड़ा रुख अपनाया। और फिर उन्होंने जूनागढ़ में भारतीय सेना को भेज दिया। वहां की जनता भी भारतीय सेना का साथ दे रही थी। इससे घबराया नवाब पाकिस्तान भाग गया, और  दिवान शाहनवाज भुट्टो जूनागढ़ का भारत मे विलय करने मे मजबूर होगया, और फिर वह भी पाकिस्तान चला गया।आखिरकार  इस तरह 20 फरवरी, 1948 को जूनागढ़ भारत का अखंड भाग  बन गया।

हैदराबाद को भारत मे कैसे मिलाया सरदार पटेल ने :- 


हैदराबाद देश की सबसे बड़ी, और सम्पन्न रियासत थी। हैदराबाद का  क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी जादा था। हैदराबाद के निजाम अली खान अपनी रियासत का विलय भारत मे करने को तयार नही थे।  हैदराबाद में सभी बड़ी पोस्ट और  सेना के बड़े पदों पर मुस्लिम थे।  जबकि वहां की 85 प्रतिशत जनता हिंदू थी। वहां की जनता भारत मे मिलना चाहती थी। 

लेकिन निजाम ने सभी की भावनाओं को कुचलते हुये 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था और अपनी सेना को मजबूत करने के लिये पाकिस्तान से हथियार खरीदने लगे। तब सरदार पटेल ने भारत को भविष्य मे होने वाले खतरे को भांपते हुये, और जनता की भावनाओं को देखते हुये, हैदराबाद को किसी भी हालात मे भारत मे मिलाने का प्लान बनाया। 

और सेना के साथ मिल कर ऑपरेशन पोलो के तहत सैन्य कार्रवाई का फैसला किया। भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो के तहत 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद मे हमला कर दिया। भारत के हमले के मात्र चार दिन बाद हैदराबाद की सेना ने 17 सितंबर हथियार डाल दिये। निजाम ने मज़बूरी मे दिल्ली आकार हैदराबाद का विलय भारत मे कर दिया। 

त्रावणकोर रियासत की भारत मे विलय की कहानी:- 


त्रावणकोर रियासत(आज का केरल राज्य) के दीवान ने घोषणा की त्रावणकोर के राजा बलराम वर्मा एक अलग देश बनाना चाहते है। वह भारत मे अपनी रियासत को नही मिलाना चाहते है। त्रावणकोर के राजा को अपने राजसी अधिकार और बंदरगाह, यूरेनियम के भंडार छिन जाने का डर था। 

यह एक बहुत सम्पन्न रियासत थी। जिन्ना ने भी राजा को भारत से अलग रहने, और पाकिस्तान के साथ आने का सुझाव दिया था। उन्होंने ने बोला पाकिस्तान मे मिल जाने पर भी आप अपना अलग   स्वतंत्र राज्य चला सकते है बस हम आपकी रक्छा और विदेश नीति देखेंगे। अथवा आप भारत और पाकिस्तान किसी के साथ ना जाये और एक स्वतंत्र देश बनाए।

राजा ने भी स्वतंत्र रहने का सोचा और माउन्ट बैटन मिले और भारत से अलग स्वतंत्र देश के रूप मे रहने का पत्र सौंपा। लेकिन माउन्ट बैटन कोई फैसला नही ले पाए। इस दौरान सरदार पटेल के भासणो से प्रभावित वहां की जनता भारत मे मिलना चाहती थी, वह अब किसी राजा की गुलाम नही रहना चाहती थी। राजा और दिवान के बहुत मानाने पर भी वहां की जनता नही मानी और उनमे राजा और दिवान के प्रति गुस्सा भरता जा रहा था।

ऐसे गुस्साए एक युवक ने त्रावणकोर के दीवान पर चाकू से हमला कर दिया। जिससे दिवान बच्च तो गये लेकिन वह बहुत डर गये और उन्हें पता चला सरदार पटेल ने अपनी सेना तयार रखी है हमला करने के लिये। इस बात से घबराये दीवान ने राजा से त्रावणकोर रियासत को भारत मे मिलाने को कहा, और सरदार पटेल के बारे मे बताया घबराये राजा ने दीवान की बात तुरंत मान ली और 14 अगस्त को त्रावणकोर रियासत का भारत मे विलय कर दिया।



लक्ष्यद्वीप को भारत मे कैसे मिलाया सरदार पटेल ने:- 


लक्षद्वीप को भारत में मिलाने में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण योगदान था। लक्षद्वीप के लोग भारत की मुख्यधारा से कटे हुए थे क्योंकी लक्षद्वीप भारत के मुख्य भू भाग से काफी दूर था इसलिए  उन्हें भारत की स्वतंत्रता की जानकारी 15 अगस्त के कई दिनों बाद मिली थी।

 लक्षद्वीप पाकिस्तान से बहुत दूर था लेकिन पाकिस्तान भारत को घेरने के लिए इस छेत्र पर कब्जा करना चाहता था। पाकिस्तान की इस प्लान का सरदार पटेल को पहले ही पता चल गया। इसलिए पाकिस्तान की ऐसी किसी भी हरकत को टालने के लिए सरदार  पटेल ने भारतीय सेना को लक्षद्वीप भेज दिया और भारतीय सेना ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज लक्षद्वीप के समुद्री तालों के पास फहरा दिया।

 कुछ दिन बाद पाकिस्तान की सेना पूरी तयारी के साथ लक्षद्वीप मे कब्जा करने लिये आई। लेकिन भारतीय तिरंगा को लक्षद्वीप फहराते देख कर पाकिस्तान की हालात खराब होगई उसे दुम दबा के वापस लौटना पड़ा। पाकिस्तान का एक और ख्वाब ही ख्वाब रह गया। और सरदार पटेल का यह प्लान भी कामयाब हो गया।   

एक और रियासत थी जिसके राजा अपनी रियासत को भारत और पाकिस्तान  मे नही मिलना चाहते थे वह रियासत थी, कश्मीर। इस रियासत को विलय कराने की जिम्मेदारी भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ली।  


कश्मीर पर नेहरू नीति से नाखुश थे सरदार पटेल :- 


कश्मीर को छोड़कर देश की सभी 562  रियासतों का विलय कराने का जिम्मा सरदार पटेल के उपर  था। कश्मीर के मामले मे उन्होंने कभी स्वतंत्र रूप से डील नहीं की। कश्मीर का मामला जवाहर लाल नेहरू के पास था।

 लेकिन नेहरू ने बहुत टाइम लगा दिया कश्मीर को भारत मे विलय कराने मे। तब तक पाकिस्तान की सेना ने कश्मीर मे हमला कर दिया। और आधे कश्मीर पर कब्जा कर लिया, तब कश्मीर के राजा हरी सिंह ने भारत से मदद मांगी फिर भारत ने अपनी सेना कश्मीर मे भेज दी। भारत जब पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से को जितने लगी तो माउन्ट बैटन ने जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया की इस मामले को 'संयुक राष्ट्र संघ' पर ले जाना चाहिए और नेहरू मान भी गये।  

 सरदार पटेल को यह फैसला बिलकुल भी मंजूर नही था। लेकिन नेहरू ने उनकी बात नही सुनी। और 'संयुक्त राष्ट्र संघ' के बोलने पर संघर्षविराम को तयार होगए, जिसकी वजह से आज आधा कश्मीर पाकिस्तान मे चला गया और यह एक इंटरनेशनल मामला बन गया। इससे पटेल बहुत नाराज हुये लेकिन गाँधी जी कहने पर वह इसका जादा विरोध नही किया। सरदार पटेल ही नही कांग्रेस के कई सदस्य नेहरू के इस फैसले से नाराज थे। और वह कहते थे की कश्मीर का भी जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया होता ये हालत ना होती।

 नेहरू यहाँ पर भी नही रुके उन्होंने कश्मीर को बहुत सारी आजादी दी जैसे एक राष्ट्र दो संबिधान, अनुच्छेद 370, 35A,  जिसका फायदा उठाकर पाकिस्तान वहां आये दिन आतंकी घटना करता रहता है। वहां के कुछ लोग भी उनका साथ देते है। क्योंकी उन्हें तो बचपन से यही बताया गया है की हम एक अलग देश है हमारे लिये संबिधान, कानून बांकी के भारत से अलग है यहाँ तक झंडा भी अलग है।

 2019 तक किसी नेता की यह हिम्मत नही हुई की वह अनुच्छेद 370 को हटा दे।  लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल मे 5 अगस्त 2019 मे  जवाहरलाल नेहरू के द्वारा की गई गलती सुधारते  हुए अनुच्छेद 370 को हटा दिया। 

सरदार पटेल की मृत्यु:- 


सरदार पटेल का मृत्यु 15 दिसम्बर 1950 को हार्टअटैक आने से हुई। मृत्यु के समय उनकी उम्र 75 साल थी। 


सरदार पटेल को प्राप्त कुछ उपलब्धियां :- 


 1:- ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खेड़ा सत्याग्रह का सफलता पूर्वक नेतृत्व 

2:- बरडोली विद्रोह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया

3:- 1922 से  1927 तक  अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष रहे 

4:- 1931 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए

5:-स्वतंत्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने

6:- भारत के राजनैतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

7:- 1991 में भारतरत्न दिया गया।  

सरदार पटेल के नाम कुछ महत्वपूर्ण धरोहर  :- 


1:- सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति  का निर्माण किया गया जो दुनिया की सबसे उच्ची मूर्ति है। इसकी लम्बाई 182 मीटर (600 फ़ीट) है। 31अक्टूबर 2018 को इसका अनावरण नरेन्द्र मोदी ने किया। 


2:- सरदार पटेल ने 1945 में नर्मदा नदी मे एक बड़े बांध को बनाने योजना बनाई थी, और साल 1961 में जवाहरलाल नेहरू ने इसकी नीव रखी। कई पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया जिसके कारण यह प्रोजेक्ट लटका रहा। जब मोदी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट को दोबारा चालू करवाया और प्रधानमंत्री बनने के बाद 2017 मे इसके पूरा होने के बाद उन्होंने इसको देश को समर्पित किया। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा डैम है। 


3:- अहमदाबाद मे मौजूद हवाई अड्डे को सरदार पटेल का नाम दिया गया। यह एक इंटर नेशनल हवाई अड्डा है।   

4:- अहमदाबाद मे मौजूद , सरदार पटेल स्टेडियम दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। यहाँ 1,10,000 दर्स्को के बैठने की छमता है, कुछ समय पहले नमस्ते ट्रम्प प्रोग्राम यही हुआ था। 

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