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Vinoba bhave biography in hindi | विनोबा भावे की जीवनी

Vinoba bhave biography in hindi | विनोबा भावे की जीवनी 




विनोबा भावे महात्मा गांधी के अनुयायी, भारत के एक जाने-माने समाज सुधारक एवं 'भूदान आन्दोलन' के संस्थापक थे। इन्होंने अपनी  समस्‍त ज़िंदगी साधु संयासियों जैसी बिताई, इसी कारण ये एक संत के तौर पर प्रसिद्ध हुए। विनोबा भावे अत्‍यंत विद्वान एवं विचारशील व्‍यक्तित्‍व वाले व्यक्ति थे। महात्मा गाँधी के परम शिष्‍य 'जंग ए आज़ादी' के इस योद्धा ने वेद, वेदांत, गीता, रामायण, क़ुरआन, बाइबिल आदि अनेक धार्मिक ग्रंथों का उन्‍होंने गहन  अध्‍ययन किया था। अर्थशास्‍त्र, राजनीति और दर्शन शास्त्र के आधुनिक सिद्धांतों का भी विनोबा भावे ने गहन अध्ययन चिंतन किया था।

 

विनोबा भावे का जीवन परिचय:-

विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को गाहोदे गुजरात में हुआ था। विनोबा भावे का पूरा नाम विनायक नरहरि भावे था, वह  कुलीन ब्राह्मण परिवार से थे। वह गाँधी जी से बहुत प्रभावित थे और उनका बहुत सम्मान करते थे उन्होंने 'गांधी आश्रम' में शामिल होने के लिए 1916 में अपनी  स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। गाँधी जी के विचारों से प्रभावित होकर भावे ने भारतीय ग्रामीण जीवन के सुधार लाने के  लिए एक तपस्वी के रूप में जीवन व्यतीत करने के लिए प्रण लिया। 

 

विनोबा भावे का प्रारम्भिक जीवन:-

विनोबा भावे का पूरा जीवन अत्‍यंत प्रखर था। वह पढ़ने मे बहुत अच्छे थे, उन्हें गणित मे विषेस रूचि थी, स्‍कूल मे गणित वह सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त करते थे। बड़ौदा में ग्रेजुएशन करने के दौरान विनाबा भावे ने मन बना लिया की वह सन्यासी बनेगे। इसलिए 1916 में इन्होंने मात्र 21वर्ष की उम्र में घर त्‍याग दिया और सन्यासी बनने के लिए इन्होंने वाराणसी की ओर रूख किया। वाराणसी(काशी) में वैदिक पंडितों के साथ में धार्मिक ग्रंथो और शास्त्रों के अध्‍ययन में जुट गए।


यह वह समय था जब भारत मे स्वतंत्रता की लड़ाई चल रही थी,  महात्मा गाँधी की चर्चा देश में चारों ओर चल रही थी कि वह दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आगये है। दक्षिण अफ्रीका मे अश्वेतों को उनके अधिकार दिलाने के लिये कई आन्दोलन किये और उनको उनके अधिकार दिला कर  भारत वापस आ गए हैं और भारत को स्वतंत्र करवाने के लिए लग  गए हैं।


जब विनोबा भावे ने गाँधी जी के बारे मे पता चला तो वह गाँधी जी से मिलने के लिए वह अहमदाबाद मे पंहुच गए। जब विनोबा भावे गाँधी जी के आश्रम मे पंहुचे तब उन्होंने देखा की गाँधी जी सब्‍जी काट रहे है, यह देख कर इन्होंने सोचा इतना प्रसिद्ध व्यक्ति खुद सब्‍जी काट रहा है, ऐसा तो विनोबा भावे जी ने कभी नहीं सोचा था। ऐसे मे उन्होंने गाँधी जी के बिना कुछ बोले स्‍वालंबन और श्रम का पाठ पढ़ लिया। इस मुलाकात के बाद वह जीवन भर गाँधी जी के साथ रहे। 

 
गाँधी जी और विनोबा भावे:-

गाँधी जी के सानिध्‍य और निर्देशन में आने के बाद विनोबा भावे के लिए जेल एक तीर्थधाम जैसी बन गई। साल 1921 से लेकर 1942 तक कई बार जेल जाना पड़ा उन्हें। साल 1922 में नागपुर मे  झंडा सत्‍याग्रह किया, इसमें ब्रिटिश हुकूमत ने सीआरपीसी की धारा109 लगा कर विनोबा को गिरफ़्तार किया। इस महान स्वतंत्रता सेनानी को नागपुर जेल में पत्थर तोड़ने का काम दिया गया। कुछ महीनों के बाद उन्हें  अकोला जेल भेजा दिया गया, उन्हें 1924 मे छोड़ा गया। 1925 में हरिजन सत्‍याग्रह करने के कारण उन्हें  फिर जेल मे डाल दिया गया। 1930 में इन्होंने गाँधी जी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह मे भाग लिया।

 
12 मार्च 1930 को गाँधी जी ने दांडी मार्च शुरू किया, इस मार्च मे शामिल होने के कारण फिर विनोबा भावे को जेल भेज दिया गया। इस बार उन्‍हें धुलिया जेल भेज दिया गया। राजगोपालाचार्य जिन्‍हें राजाजी भी कहा जाता था, उन्‍होंने विनोबा भावे के विषय में 'यंग इंडिया' जैसे प्रसिद्ध समाचार पत्र में लिखा था कि विनोबा भावे मे देवदूत जैसी पवित्रता है, वह  आत्‍मविद्वता, तत्‍वज्ञान और धर्म के उच्‍च शिखरों पर विराजमान है। जेल की किसी भी श्रेणी में उसे रख दिया जाए वह जेल में अपने साथियों के साथ कठोर श्रम करता रहता है। अनुमान भी नहीं होता कि य‍ह मानव जेल में चुपचाप कितनी यातनाएं सहन कर रहा है।

वह गाँधी जी के साथ कदम से कदम मिला कर चलते रहे, धीरे धीरे वह काफी प्रसिद्ध हो गये, लेकिन प्रसिद्धि की चाहत से दूर विनोबा भावे भारत को स्वतंत्र कराने मे लगे रहे। 9 अगस्त  1942 में उन्हें, गाँधी जी को और अन्य कांग्रेसी बड़े नेताओं कों  गिरफ़्तार कर लिया गया। इस बार उन्हें पहले नागपुर जेल में फिर वेलूर जेल में भेज दिया गया।

 

बहुभाषी व्यक्तित्त्व के धनी:- 

जेल में ही रह कर विनोबा भावे ने  अरबी और फारसी भाषा का अध्‍ययन किया और वह उनमें पारंगत भी हो गये। विनोबा भावे  बुद्धि का अंदाजा इस बात से लगा सकते है की उनको पहले से ही मराठी, संस्कृत, हिंदी, गुजराती, बंगला, अंग्रेज़ी, फ्रेंच भाषाओं में तो वह पहले ही पारंगत थे। समस्‍त अर्जित ज्ञान को अपनी ज़िंदगी में लागू करने का भी उन्‍होंने अप्रतिम एवं अथ‍क प्रयास किया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विनोबा भावे पर निम्न  पंक्तियाँ लिखीं-धन्य तू विनोबा !जन की लगाय बाजी गाय की बचाई जान,धन्य तू विनोबा। तेरी कीरति अमर है।दूध बलकारी, जाको पूत हलधारी होय,सिंदरी लजात मल –मत्र उर्वर है।घास–पात खात दीन वचन उचारे जात,मरि के हू काम देत चाम जो सुघर है।बाबा ने बचाय लीन्ही दिल्ली दहलाय दीन्ही,बिना लाव लस्कर समर कीन्हो सर है।

 

विनोबा भावे का साहित्यिक योगदान :-

विनोबा भावे एक महान विचारक, लेखक भी थे, उन्होंने ना जाने कितने लेख लिखे साथ-साथ संस्कृत भाषा को आमजन मानस के लिए सहज बनाने का भी सफल प्रयास किया। विनोबा भावे एक बहुभाषी व्यक्ति थे। उन्हें लगभग सभी भारतीय भाषाओं का ज्ञान था। वह एक उत्कृष्ट वक्ता और समाज सुधारक थे। विनोबा भावे के अनुसार कन्नड़ भाषा  विश्व की सभी 'भाषाओ की रानी' है। विनोबा भावे ने गीता, क़ुरआन, बाइबल जैसे धर्म ग्रंथों का भी अध्ययन किया और उनका  अनुवाद किया। विनोबा भावे भागवत गीता से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। वो कहते थे कि भागवत गीता उनके जीवन की हर एक सांस में है। उन्होंने भागवत  गीता का मराठी भाषा में अनुवाद  भी किया था।

 

भूदान आन्दोलन मे विनोबा भावे का योगदान:-

जब भूदान आन्दोलन की शुरुआत हुई तब विनोबा भावे आन्ध्र प्रदेश के गाँवों में भ्रमण कर रहे थे, भूमिहीन लोगों और हरिजन लोगों  के एक समूह के लिए ज़मीन मुहैया कराने की अपील की तब  एक ज़मींदार ने उन्हें एक एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव दिया। इससे प्रभावित होकर विनोबा भावे गाँव-गाँव जाकर भूमिहीन लोगों के लिए भूमि का दान करने की अपील करने लगे और उन्होंने इस दान को गांधीजी के अहिंसा के सिद्धान्त से संबंधित कार्य बताया।

विनोबा भावे के अनुसार, यह भूमि दान कार्यक्रम हृदय परिवर्तन के तहत होना चाहिए न कि जबरजस्ती ज़मीन के बँटवारे के माध्यम से, इससे इस बड़े आंदोलन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, विनोबा भावे ने घोषणा की कि वह हृदय के बँटवारे से ज्यादा ज़मीन के बँटवारे को ज़्यादा पसंद करते हैं। 



विनोबा भावे का मौन व्रत:-

1975 में विनोबा भावे ने पूरे वर्ष के लिए मौन व्रत रखा और  अपने अनुयायियों के राजनीतिक आंदोलनों में शामिल होने के कारण उन्होंने मौन व्रत रखा। 1979 मे उन्होंने आमरण अनशन किया जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने समूचे भारत में गो-हत्या पर निषेध लगाने हेतु क़ानून पारित करने का आश्वासन दिया।

 

विनोबा भावे का निधन:-

 80 दशक आते आते विनोबा भावे वृद्ध हो चुके थे, उन्होंने अन्न-जल सब त्याग दिया था। जब विनोवा भावे जी के समर्थकों को पता चला की उन्होंने अन्न जल त्याग दिया है तब उनके समर्थको और परिवार वालों ने उनसे चैतन्यावस्था में बने रहने के लिये अन्न जल ग्रहण करने का आग्रह किया, लेकिन विनोबा भावे ने कहा उन्हें वायु और आकाश आदि से ऊर्जा प्राप्त होजाती हैं। इस प्रकार अन्न जल त्यागने के कारण एक सप्ताह के अन्दर ही 15 नवम्बर 1982 को वर्धा, महाराष्ट्र में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये।
विनोबा भावे जी की मृत्यु के बाद पवनार आश्रम मे उन्हें उनकी सभी बहनों ने उन्हें संयुक्त रूप से मुखाग्नि दी। 


((यहाँ पर हमनें आपको विनोबा भावे के जीवन के बारे में बताया, यदि आपको उनके बारे मे और कोई जानकारी चाहिए या आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्न आ रहा है, तो कमेंट बाक्स के माध्यम से पूँछ सकते है, हम आपके द्वारा की गयी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार कर रहे है)) 
 

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