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alluri sitaram raju biography in hindi | अल्लूरी सीताराम राजू का जीवन परिचय | alluri sitaram raju in hindi


alluri sitaram raju biography in hindi | अल्लूरी सीताराम राजू का जीवन परिचय 

 

 उपलब्धियां :


अल्लुरी सीताराम राजू वह सख्स थे जिन्होंने आंध्र प्रदेश मे लोगों के मन से ब्रिटिश सरकार के डर को निकाल फेंका और उन्हें अंग्रेजो के खिलाफ असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। अल्लूरी सीताराम राजू ने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दिया था, वह अपने प्राणों को बलिदान करने वाले वीर क्रांतिकारी शहीदों में से एक थे। लेकिन उनको उत्तर भारत मे बहुत ज्यादा ख्याति प्रपाप्त नहीं हुई थी, लेकिन दक्षिण भारत मे उन्हें बहुत माना जाता है।

 (आप को भी उनके बारे मे ज्यादा नहीं पता होगा लेकिन जब राम चरण तेजा ने RRR मूवी मे इनकी भूमिका निभाई तो अल्लुरी सीताराम राजू की चर्चा होने लगी) 


अल्लुरी सीताराम राजू का जीवन :-


अल्लुरी सीताराम राजू का 4 जुलाई 1897 मे आंध्र प्रदेश मे हुआ था। तब पढ़ाई के आज जितने साधन नहीं थे इसलिए ज्यादा औपचारिक शिक्षा तो उन्हें
प्राप्त नहीं हो पाई थी। लेकिन उन्होंने अध्यात्म की शिक्षा अपने परिवार के एक सदस्य से प्राप्त की फिर वह अध्यात्म की और बढ़ते गये। वे काली माँ के उपासक थे, फिर मात्र 18 वर्ष की उम्र में वह सन्यासी जीवन जीने का निश्चय करते है और चारों धाम की यात्रा मे निकल जाते है।  

अल्लुरी सीताराम का सन्न्यासी जीवन:-


तीर्थयात्रा से वापस आने के बाद उन्होंने कृष्णदेवीपेट में आश्रम बनाया और वहीं ध्यान व साधना करने लगे और रहने लगे। कुछ महीने आश्रम मे रहने के बाद वह दूसरी बार तीर्थयात्रा मे निकले, इसबार नासिक जा रहे थे, और यह यात्रा उन्होंने पैदल पूरी की। इसी दौरान उन्हें अंग्रेज सरकार के द्वारा की जा रही क्रूरता को देखा,  यह वह वही समय था जब पूरे भारत में अंग्रेज सरकार के खिलाफ असहयोग आन्दोलन चल रहा था। आन्ध्र प्रदेश में भी असहयोग आन्दोलन चरम सीमा तक पहुँच गया था। तो वह सन्यासी जीवन को छोड़कर इसी आन्दोलन मे जुड़ गये। 


अल्लूरी सीताराम राजू का क्रन्तिकारी जीवन :-


अल्लूरी सीताराम राजू असहयोग आंदोलन को गति देने के लिए आम जन को इस आंदोलन मे शामिल करने लगे, और लोगों के मन से ब्रिटिश सरकार के डर को  निकाल फेंका। इसी दौरान वह महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित हुए, और गाँधी जी की ही तरह अहिंसा के मार्ग को चुना ब्रिटिश सरकार के खिलाफ।

 इसके लिए उन्होंने पहले अलग-अलग समूह मे बाटे आदिवासियों को इकठ्ठा किया, और उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन मे भाग लेने को कहा। उनका प्रयास चल ही रहा था, लेकिन एक वर्ष होते होते गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया क्योंकि उन्होंने जो सोचा था वैसा नहीं हो पाया। 


सीताराम राजू गाँधी जी के इस फैसले काफी प्रभावित हुये और अब उन्होंने गाँधी जी के अहिंसा के रास्ते को छोड़कर सशस्त्र विद्रोह करने का फैसला किया और किसी भी तरह अंग्रेजो को भारत से खदेडने का प्रण लिया। 


और देश के अन्य क्रांतिकारियों से मिलने के लिए वह भारत की यात्रा मे निकले, इसी यात्रा के दौरान  उनकी मुलाक़ात महान क्रांतिकारी पृथ्वीसिंह आज़ाद से हुई। इसी मुलाक़ात के दौरान पृथ्वीसिंह आज़ाद ने इनको चटगाँव के एक क्रांतिकारी संगठन के बारे मे बताया, जो गुप्त रूप से कार्य करता था। वहां जाकर उन्होंने गोर्रिला युद्ध कैसे किया जाता है, अंग्रेजो के खिलाफ लोगों को कैसे खड़ा करना है सीखा और उन्होंने घुड़सवारी करना, तीरंदाजी करना सीखा। 

चटगांव से वापस आने के बाद उन्होंने साधु-सन्न्यासियों को अपने समूह मे जोड़ने के लिए पुरे देश मे भ्रमण किया। इसके लिए  सीताराम राजू ने मुम्बई, बड़ोदरा, बनारस, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, असम, बंगाल और नेपाल तक की यात्रा की। और जब वह सब सीख गये और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए सैन्य सगठन की स्थापना कर ली तब उन्होंने अंग्रेजो से छापामार युद्ध शुरू कर दिया। 


क्रांतिकारी आंदोलन:-


अल्लुरी सीताराम राजू ने आंध्र प्रदेश के रम्पा क्षेत्र को अपने  क्रांतिकारी आन्दोलन का केंद्र बना लिया, क्योंकी रम्पा क्षेत्र का मालावार पर्वतीय क्षेत्र छापामार युद्ध के लिए अनुकूल था। इसके अलावा यहाँ रहने वाले लोगों का पूरा समर्थन उन्हें मिल रहा था। देश को अंग्रेजो से स्वतंत्रता दिलाने  के लिए प्राण तक न्यौछावर करने वाले लोग उनके साथ थे। 

कुछ वक्त मे ही उन्होंने अपनी सेना बना ली और अपनी सेना मे मल्लू डोरे और गौतम डोरे नामक बंधुओ को लेफ्टिनेट बनाया। अल्लुरी सीताराम राजू और उनकी सेना शुरुआत मे अंग्रेजो से तलवार, भले, तीर और कमान से लड़ रहे थे। लेकिन अंग्रेजो के आधुनिक हथियार के खिलाफ धनुष और बाण ज्यादा काम नहीं आरहे थे,   फिर वह समझ गये अंग्रेजो का सामना करना है तो उन्हें आधुनिक शस्त्रों की आवश्यकता है। आधुनिक शास्त्र हासिल करने के दो ही रास्ते थे या तो धन से खरीदें या शस्त्र लूटे जाये। धन अर्जित करने के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार का धन लूटना शुरू कर दिया  और इससे मिलने वाले धन से उन्होंने आधुनिक शस्त्र को ख़रीदा।  

शस्त्र खरीदने के बाद उन्होंने पहला हमला 22 अगस्त 1922 को चिंतापल्ली में किया और यहाँ से कई शस्त्रों को लूटा। फिर  कृष्णदेवीपेट के पुलिस स्टेशन पर हमला किया और अपने साथियो को छुड़वाया। 


ब्रिटिश सरकार और अल्लुरी सीताराम का संघर्ष :-


ब्रिटिश सरकार अल्लूरी सीताराम राजू द्वारा किये गये हमलों से काफी हिल गई थी। ब्रिटिश सरकार यह जान चुकी थी की अल्लूरी राजू कोई सामान्य डाकू नहीं है। उनके पास संगठित सैन्य बल है, यह अंग्रेज़ों को अपने प्रदेश से बाहर निकाल फेंकना चाहते है।


ब्रिटिश सरकार सतर्क होगई और सीताराम राजू को पकड़वाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने स्कार्ट और आर्थर नाम के दो अधिकारियों को इस काम पर लगा दिया। लेकिन अल्लुरी सीताराम राजू इतनी आसानी से पकड़ मे आने वाले नहीं थे, उन्होंने तो ओजेरी गाँव के पास अपने 80 साथियों के साथ मिलकर उन दोनों अंग्रेज़ अधिकारियों को पकड़ लिया और मार गिराया। 

इस मुठभेड़ से अल्लुरी सीताराम राजू और उनके साथियो को और फायदा हुआ, उन्हें इस मुठभेड़ से  ब्रिटिशों के अनेक आधुनिक शस्त्र भी उन्हें मिल गए। यह बहुत बड़ी जीत थी, और इस विजय से उत्साहित होकर सीताराम राजू ने अंग्रेज़ों को आन्ध्र प्रदेश छोड़ने की धमकी देदी और इसके इश्तहार पूरे क्षेत्र में लगवा दिये। 

इससे अंग्रेज़ सरकार और भी क्रोध से भर गई। फिर ब्रिटिश सरकार ने सीताराम राजू के ऊपर  दस हज़ार रुपए के इनाम की घोषणा करवा दी। लेकिन उसका उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकी कोई भी व्यक्ति अल्लुरी सीताराम राजू के बारे मे बताने को कोई तयार नहीं था। 

 किसी भी तरह अल्लुरी सीताराम राजू गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए लाखों रुपया खर्च किया गया। यह किसी भी एक व्यक्ति को पकड़ने के लिए किया जाने वाला सबसे ज्यादा खर्च था।  मार्शल लॉ जैसे सैनिक बन्दोबस्त किया गया, फिर भी ब्रिटिश सरकार उन्हें पकड़ नहीं पा रही थी। 

अब ब्रिटिश सरकार ने यहाँ भी  अपना पुराना फार्मूला अपनाया 'फूट डालो और शासन कारों' लेकिन यहाँ के लोगों के ऊपर यह फार्मूला काम नहीं आया और दिन प्रतिदिन लोग उनकी सेना मे भर्ती होते रहे। 


अल्लुरी सीताराम राजू और पुलिस मुठभेड़:-


अल्लुरी सीताराम ब्रिटिश सरकार पर लगातार हमले करते रहे, ब्रिटिश सरकार ने छोड़ावरन और रामावरन इलाके मे उन्हें पकड़ने की योजना बनाई थी, लेकिन अल्लुरी सीताराम के जासूसों का गिरोह ने पहले ही ब्रिटिश सरकार की योजना का पता लगा लिया था, जिससे ब्रिटिश सरकार फिर अल्लुरी सीताराम को नहीं पकड़ पाई। लेकिन उनके साथी क्रन्तिकारी पृथ्वीसिंह आज़ाद पकड़े गये, जब अल्लुरी सीताराम को इस बात का पता चला तो उन्होंने प्रण लिया वह उन्हें छुड़ा कर रहेंगे तब पृथ्वीसिंह को  राजमहेन्द्री जेल में रखा गया था। 


अल्लुरी सीताराम की ताकत व संकल्प से ब्रिटिश सरकार अब तक भली भांति परिचित हो चुकी थी, इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा  आस-पास की जेलों से भी पुलिस बल मंगवाकर राजमहेंद्री जेल की सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया। लेकिन सरकार का यह योजना उल्टी पड़ गई जब सीताराम राजू ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर अलग-अलग जेलों पर एक साथ हमला कर दिया। इससे हमले से घबराई सरकार फिर पुलिस को वापस भेजनें लगी, तब अल्लुरी सीताराम ने अपने मित्र पृथ्वीसिंह को छुड़वा लिया। इससे फायदा यह हुआ की ब्रिटिश सरकार का मनोबल गिर गया और अल्लुरी सीताराम की सेना ने सरकार के भंडार से शस्त्रों और धन को लूट लिया, जो उनके और उनकी सेना के लिए काफी था। 

अल्लुरी सीताराम के बढ़ते हुए कद से ब्रिटिश सरकार काफी घबरा गई आंध्रा प्रदेश की पुलिस उन्हें नहीं सम्हाल पा रही थी तब केंद्रीय सरकार ने उन्हें पकड़ने का जिम्मा लिया और फिर सरकार ने असम रायफल्स नाम से एक सेना का गठन किया जो सिर्फ अल्लुरी सीताराम को पकड़ने के लिए थी। यह बहुत बड़ी सेना थी इसमें अत्याधुनिक हथियार से लैस कई हजार सैनिक थे।  

1923 मे सेना के गठन के बाद जनवरी 1924 से सेना बीहड़ों और जंगलों में सीताराम राजू को खोजती रही। आखिर कार  मई 1924 में अंग्रेज़ सैनिक उन तक पहुँचने मे कामयाब रहे, फिर  किरब्बू नामक स्थान पर दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। 

अल्लुरी सीताराम राजू का स्वर्गवास :-


6 मई 1924 मे किरब्बू नामक स्थान यह युद्ध शुरू हुआ, ब्रिटिश सरकार की सेना असम रायफल्स का नेतृत्त्व उपेन्द्र पटनायक कर रहे थे, दोनों ही ओर की सेना को काफी छति पहुंची, अनेक सैनिक मारे गये। अगले दिन 7 मई को भी युद्ध जारी रहा, अधिक संख्या मे ब्रिटिश सैनिक होने के कारण आखिर कार ब्रिटिश सरकार को सफलता मिली उन्होंने साम होते होते अल्लुरी सीताराम राजू को पकड़ लिया, और मौत के घाट उतार दिया।   लगभग दो सालों तक ब्रिटिश सरकार की नींद हराम करने वाले यह वीर क्रन्तिकारी शहीद हो गये। अल्लूरी सीताराम राजू के देहांत होजाने के बाद भी ब्रिटिश सरकार को विद्रोही अभियानों से मुक्ति नहीं मिली।  

((यहाँ पर हमनें अल्लुरी सीताराम राजू के जीवन के बारे में और उनके संघर्ष के बारे मे बताया है, यदि आपको उनके बारे मे और कोई जानकारी चाहिए या आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्न आ रहा है, तो कमेंट बाक्स के माध्यम से पूँछ सकते है, हम आपके द्वारा की गयी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार कर रहे है)) 

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